Wednesday, 17 August 2016

माहुरी परिवार

माहुरी परिवार अपने धमॅ और संस्कृति की रक्षा, कट्टर मुगल शासक अौरंगजेब की दमनात्मक धमॅपरिवतॅन नीति से परहेज के उपक्रम में,करीब 400 वर्ष पुर्व, अपने उदगम स्थल मथुरा से दूर गया शहर में पूरे ७०० परिवार के साथ पहुंच कर, अपने धमॅ को बचा पाये। परन्तु, वहाँ भी कुछ समय के अन्तराल कट्टर शासक की सेना  ढूंढते हुए आ धमकी। इतनी बङी मुगल सेना से टक्कर न लेने में होशियारी समझते हुए,अधिकतर माहुरी परिवार, अधिक उरवरक और सम्बृध स्थानों को सुरक्षित नहीं समझ,वहाँ नहीं बसे, नजदीक केे छोटे छोटे कस्बे, जो उस समय वियावान और जंगल प्राय: थे बीहार शरीफ,हिसुआ,बरबीघा,कोडरमा जैसे स्थानों और घने जंगलों  में अवस्थित एकान्त स्थल गिरीडीह क्षेत्र, मुगल सेना की पहुंच से बाहर, स्थानों में वित्रित हो गये।                                                     इस क्रम में माहुरी परिवार दो भागों में विभक्त हो गये, एक भाग गया,कोडरमा,नवादा,बीहार शरीफ,बरबीघा व इनके नजदीक स्थलों के साथ "मगध" प्रदेश हुए,                                                            दूसरा भाग गिरीडीह अौर इससे नजदीक स्थलों को, मगध से दक्षीन कीअोर, "दखीन" प्रदेश माने गये।                                    ये विभक्ति, स्थानों की दूरगमता के कारण अनायास ही हो गई, क्योंकि उस समय मगध से दक्षिण के रास्ते नहीं बराबर थे और यात्रा प्राय: कष्टपूणॅ और असंम्भव तुल्य थे। हलाकि, कोडरमा और गिरीडीह की दूरी  कम थी, वहाँ भी यात्रा की स्थिती, एक बराबर, नामुमकीन सी थी।                                             इस तरह माहुरी परिवार करीब २०० वषोॅं तक इतने अलग- थलग एक दूसरे से अनजान रहे कि इन्हें एक दूसरे का होने का ज्ञान नहीं था। इस दरमीयां, सबसे पहले इनकी भाषा में मूल परिवॅतन आया, साथ ही साथ सोच विचार,रहन सहन भी जगहनुसार बदले।                                          सन् १८५० और १९०० के बीच के वषों में कुछ नये रास्ते व रेलवे (माल ढुलाई वाले) भारत के कई शहरों में विधिवत शुरू हुई तब  लोग इन जगहों पर कठीनाई से परिपूणॅ रास्ते तय कर पानेे की शुरूवात की और लोग अवगत हुए, की माहुरी परिवार से मिलते जुलते परिवार, मगह और दखीन में, एक दूसरे से अनभिग्य, अवस्थित हैं।                            माहुरी परिवार शुरू से ही काफी उन्नत, व्यापारिक सूझ बूझ के धनी और बुद्धीमान रहे हैं वे छोटे जंगल प्राय जगहों पर बसते हुवे भी अपनी साम्राज कायम कर ली और मगह व दखीन दोनों स्थानों में जमींदारी जैसी संबृध मजबूत स्थिती बना ली। जैसे जैसे industrilisation और व्यापार बढ़े, ये व्यापार में भी सिद्हस्तता हासिल किया और संगठित होते हुए 1912 में  मगध महामंडल एवं 1913 में हजारीबाग महामंडल का गठन क्रमश: गया और गिरीडीह में स्थापित कर ली ।                              माहुरी जमींदारी में पैठ बनाने के उपरांत देश के विभिन्न शहरों में व्यापार में भी काफी संबृधी हासिल कर ली।                                                             झरिया शहर के निवासी, प्रसिद्ध कोयले के व्यावसायी स्व.प्रभू दयाल गुप्त  ने माहुरी मयंक पत्रिका का सवॅप्रथम कमला प्रेस स्थापित कर,  प्रकाशन  व  नि:शुल़़्क वितरण करवा कर, माहुरी इतिहाल में एक अध्याय जोङा। उनके  भ्राता  स्व. खीरी राम गुप्त  प्रेस की बागडोर बखूबी संभाली और माहुरी मयंक काफी सूझ बूझ से समाज में नि:शुल्क वितरण करवाए। खीरी राम जी  एक अच्छे घुङसवार थे, उस अंतराल, दूरगामी प्रदेश सफर करने के लिए घुङसवारी ही सबसे उपयुॅक्त साधन थे, परिवार के कोयले उत्पादन व व्यापार अधिकतर मध्य प्रदेश को, रेलवे के वैगन द्वारा विक्रय होते, वे पैसे कुझ महीनों के अन्तराल, घोङे की सवारी कर वे प्राप्त कर लेते अन्यथा माहुरी मयंक के प्रकाशन और वितरण करने हेेतु कमला प्रेस के कुशल संचालन उन्ही के हांथों सम्पंन हुआ करता था। उस समय पूरे राज्य भर में बहुत कम संख्या में मुद्रालय थे, प्रेस संचालन उस समय  एक कठिन कायॅ था। सामाजिक कामों के लिए इतनी आस्था आज एक आश्चयॅ से कम नहीं।                                                                                       देश में माल ढुलाई वाली रेलवे के बाद यात्री रेल की शुरूवात हुई और आवागमन के दूसरे साधनों नें व्यापार में तेजी लाई। माहुरी के केन्द्र गया और गिरीडीह  के  महुरी व्यवसाइयों  ने व्यापार में आशातीत सफलता प्राप्त कर ली । उनमें से गया केेे राय बहादुर रामचन्द्र राम चंद भदानी    व्यापार मंडी में सवोॅॅच स्थान पाये। कोडरमा के छटठू राम भदानी, होरील राम, दशॅन राम ई. व गिरीडीह के कमलापति राम ई. अबरख जैसै उस समय के rare खनिज पर अपनी अधिपत्य कायम कर ली । झरिया के प्रभू दयाल गुप्त ने कोयले के उत्यपादन और वितरण में निपुणता हासील की और  राम चन्द राम व झटठूराम जी से partnership स्थापित कर उस दौर में एक Cartel बना डाली । कालान्तर में, राय बहादूर राम चन्द राम ने कोयले के उत्पादन के लिये रामगढ़ में लपंगा कोलियरी खरीदा, उसके उपरान्त रामगढ़ इलाके में भदानी नगर बसाया । अागे चलकर वे एशिया के सबसे अच्छी Glass Industry, Bhurkunda glass factory लगाये । सन् १९४७ में वहां १००० लोग कायॅ रत्त थे व १५००० लोग जुङे थे।                                                          मगध और दखीन, यानि गया,नवादा,बीहार शरीफ,हिसुआ,बरबीघा,कोडरमा के माहुरी तथा गिरीडीह और उस तरफ के माहुरी बिलकुल अलग थलग थे, कोई रिस्ता,शादी विवाह नहीं होते थे, १९२६ के माहुरी महाअधिवेसन की अध्यक्ष प्रभू दयाल गुप्त अपने दो भाईयों की और हिसुआ के जमींन्दार के पुत्र के शादी गिरीडीह के बरकट्ठा की कन्याओं से घोषना कर ,इन तीन शादियो से ,मगह और दखीन को एक कर माहुरी समाज के दायरे को बढ़ा दीया।                                                           यह मिलन समाज को देश के बङे व्यापारिक परिवारों के बराबरी तक पहंचा पाया। दोनों स्थानों के व्यापारी बङे बङे साझेदारी कर पाये, उनमें से छटठू राम,होरील राम,दशॅन राम की साझेदारी देश के सबसे प्रगतीशील Parneship हुए और १९३७ में पुन: एक Cartel लाला गुरू शरण, पुत्र राय बहादुर राम चन्द राम ,के साथ बना कर "गया काॅटन एन्ट जूट मील्स " की स्थापना कर दी। जो पूरे गया शहर को बहुत समय तक बिजली भी मुहैया करवाया। कुछ ही वषों  में लाला गुरूशरण लाल पूरे देश की industries पर, कई शुगर मील,कई काॅटन मील , ग्लास मील ई. स्थापित कर अपना परचम लहराया व FICCI, फेडेरेशन औफ इन्डीयन चेम्बर औफ कौमॅॅस एन्ड इ्न्डस्ट्रीज , के chairman चुने गये।                                             

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